2030 तक 13 करोड़ होगी बुजुर्गों की संख्या, इनकी सेवाओं से जुड़ी फील्ड में करिअर का मौका देगी जेरोन्टोलॉजी

  • जेरोन्टोलॉजी के तहत बढ़ती उम्र के साथ वृद्धों में होने वाले परिवर्तनों पर शोध करने का मिलता है अवसर
  • जेरोंटोलॉजिस्ट के द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर बुजुर्गों के लिए तैयार की जाती हैं नीतियां

दैनिक भास्कर

Apr 17, 2020, 09:39 AM IST

यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) के अनुसार 2030 तक भारत में तकरीबन 12.5% जनसंख्या की उम्र 60 साल होगी। वहीं 2050 तक यह संख्या बढ़कर 20% हो जाएगी। भारत में अभी करीब 9 करोड़ बुजुर्ग हैं, 2030 तक इनकी संख्या लगभग 13 करोड़ होगी। जाहिर है बुजुर्गाे के लिए विभिन्न तरह की नीतियां, इन्हें होने वाली बीमारियों के लिए दवाइयों का उत्पादन, मेडिकल स्टाफ का गठन, पेंशन सम्बंधी योजना आदि पर आने वाले समय में खासा काम किया जाएगा। ऐसे में वे स्टूडेंट्स जिन्होंने बायोलॉजी, सोशियोलॉजी जैसी फील्ड्स में ग्रेजुएशन किया है और बुजुर्गों से जुड़ी फील्ड में काम करना चाहते हैं, उनके लिए जेरोन्टोलॉजी एक अच्छा विकल्प है।

इसके तहत वृद्धजनों में होने वाले विभिन्न जैविक, सामाजिक, शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है ताकि इन परिवर्तनों से बुजुर्गों में होने वाली बीमारियों का अंदेशा लगाया जा सके और उन्हें इसके लिए सक्रिय व सतर्क किया जा सके। ऐसे में जेरोन्टोलॉजिस्ट की मांग बढ़ना तय है। अगर आप भी जेरोन्टोलॉजिस्ट बनना चाहते हैं तो कोर्स और इंस्टीट्यूट के बारे में दी गई जानकारी आपके लिए मददगार साबित होगी।

जेरोन्टोलॉजी और जेरिएट्रिक्स हैं अलग-अलग

कई बार स्टूडेंट्स जेरोन्टोलॉजी और जेरिएट्रिक्स को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। जेरोन्टाेलॉजी, विज्ञान की ही एक शाखा है। जिसके अंतर्गत उम्र बढ़ने की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। यानी उम्र बढ़ने के साथ हमारे शरीर के अंदर होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन इसमें शामिल है। शरीर में होने वाले बदलाव हमारे जीवन जीने के तरीकों पर निर्भर करता है। यही कारण है कि यह परिवर्तन हर बुजुर्ग में भिन्न होते हैं। लेकिन नीति बनाने के लिए एक एनालिसिस जरूरी है जो जेरोन्टोलॉजिस्ट का काम होता है। वहीं वृद्धों में बीमारियों को रोकने और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली कला और विज्ञान जेरियाट्रिक निवारण के तहत आती है। इसका उद्देश्य वृद्ध आबादी के स्वास्थ्य को बनाए रखना और बीमारी को शुरुआत में पहचान कर उपचार करना होता है।

सर्टिफिकेट से लेकर पोस्ट डिप्लोमा तक के कोर्स

किसी भी क्षेत्र से बारहवीं कक्षा पास करने वाले स्टूडेंट्स डिप्लोमा इन जेरोन्टोलॉजी प्रोग्राम में एडमिशन ले सकते हैं। वहीं बायोलॉजी, सोशियोलॉजी, साइकोलॉजी और थेरेपी में ग्रेजुएशन करने वाले स्टूडेंट्स विभिन्न इंस्टीट्यूट्स/कॉलेजेस से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन जेरोन्टोलॉजिकल नर्सिंग, पीजी डिप्लोमा कोर्स इन जेरोन्टोलॉजी एंड एज मैनेजमेंट और पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन हेल्थ एंड सोशल जेरोन्टोलॉजी जैसे कोर्स की पढ़ाई कर सकते हैं। भारत में इस क्षेत्र में डिप्लोमा व पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स ही उपलब्ध हैं।

फॉरेन से कर सकते हैं ऑनलाइन कोर्स

  • स्टूडेंट्स यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया
  • ड्यूक यूनिवर्सिटी
  • जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी
  • यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ फ्लोरिडा
  • मियामी यूनिवर्सिटी – ऑक्सफोर्ड
  • यूनिवर्सिटी ऑफ जॉर्जिया 

इसके अलावा स्टूडेंट्स स्वयं पोर्टल से सर्टिफिकेट कोर्स – जेरोन्टोलॉजिकल सोशल वर्क की पढ़ाई कर सकते हैं।

इन इंस्टीट्यूट से कर सकते हैं पढ़ाई

  • टाटा इंस्टीट्यूट्स ऑफ सोशल साइंसेस (टीआईएसएस), मुम्बई
  • कलकत्ता मेट्रापोलिटन इंस्टीट्यूट ऑफ जेरोन्टोलॉजी, कोलकाता
  • इंस्टीट्यूट ऑफ होम इकोनॉमिक्स (आईएचई), नई दिल्ली

करिअर

जेरोन्टोलॉजी की दो मुख्य ब्रांचेज, सोशल जेरोन्टोलॉजिस्ट और बाई जेरोन्टोलॉजिस्ट हैं। सोशल जेरोन्टोलॉजिस्ट पेशेंट्स के साथ काम करते हैं और इस बात पर अध्ययन करते हैं कि किस तरह इन बुजुर्गों की जिन्दगी को और भी ज्यादा आसान और आरामदायक बनाया जाए। वहीं बाई जेरोन्टोलॉजिस्ट, फिजिकल और बायोलॉजिकल आस्पेक्ट्स की पढ़ाई करते हैं। जेरोन्टोलॉजिस्ट होम्स हेल्थ केयर, रिटायरमेंट होम्स, एडल्ट डे केयर जैसे नर्सिंग होम या सेंटर्स फॉर सीनियर सिटीजन में नर्स के रूप में काम कर सकते हैं। इसके साथ ही बतौर सोशल वर्कर भी अपनी सेवा दे सकते हैं। इसके अलावा रिटायरमेंट प्लानिंग, ट्रैवल एंड रिक्रिएशन, फिटनेस एंड हेल्थ केयर आदि पर काम करने वाली प्राइवेट कम्पनीज में बतौर कंसल्टेंट्स भी काम कर सकते हैं। इसके अलावा कॉलेज, हॉस्पिटल्स और यूनिवर्सिटी में भी नौकरी पा सकते हैं।

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