कोविड-19 के दौर में तेजी से बढ़ा एजुकेशन टेक का इस्तेमाल, इन 4 तरीकों से चुनें अपने बच्चों के लिए ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफॉर्म

दैनिक भास्कर

May 10, 2020, 09:27 AM IST

कोविड-19 के दौर में एजुकेशन टेक (एडटेक) ऐप/वेबसाइट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। कई विकल्पों में से अपने बच्चे के लिए किस ऐप/वेबसाइट को चुना जाए, इसके लिए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में एआई और मशीन लर्निंग के प्रमुख के फर्थ-बटरफील्ड और फेलो सेथ बर्गेसन ने चार तरीके बताए हैं:

1. शैक्षणिक आधार और रचनात्मकता बढ़ाने वाला हो: प्लेटफॉर्म का बच्चों को पढ़ाने के लिए मजबूत शैक्षणिक आधार हो और अपने शैक्षणिक मूल्य और प्रभाव को दर्शाने के लिए उसके पास पर्याप्त डेटा हो। उसके प्रभाव के बारे में ऑनलाइन जाचें। इसके लिए ऐसी साइट्स भी हैं जो एडटेक ऐप/वेबसाइट का मूल्यांकन करती हैं। जैसे ‘कॉमन सेंस मीडिया’। साथ ही सिर्फ पढ़ाना काफी नहीं है, एडटेक प्लेटफॉर्म को क्रिएटिविटी बढ़ाने वाला भी होना चाहिए। गैलप एजुकेशन स्टडी के मुताबिक जिन छात्रों के पाठ्यक्रम में रचनात्मकता भी होती है वे बेहतर ढंग से सीखते हैं।

2. प्राइवेसी प्राथमिकता हो, बच्चे का डेटा सुरक्षित रहे: सेफ्टी पॉलिसी स्पष्ट हो ताकि बच्चे को बुलिइंग, शोषण या अन्य सुरक्षा जोखिमों से बचाया जा सके। अगर बच्चे प्लेटफॉर्म पर किसी अन्य व्यक्ति से बात कर पाते हैं तो वे असुरक्षित हो सकते हैं और पैरेंट्स के लिए भी ऑनलाइन एक्टिविटी ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। प्राइवेसी पॉलिसी भी स्पष्ट हो और पैरेंट्स के पास बच्चों के डेटा की निगरानी का अधिकार हो। उन्हें पता हो कि बच्चे की कौन-सी जानकारी ली जा रही है। अगर पैरेंट्स एप को डेटा लेने की अनुमति देते हैं, तो यह सुनिश्चित करें कि वह डेटा सुरक्षित रखता हो और उसे थर्ड पार्टीज को न बेचता हो।

3. जिम्मेदारी को बढ़ावा दे और लत से बचाए: एजुकेशन ऐप/वेबसाइट ऐसी हो जिसमें जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को रोकने के लिए सीमाएं हों। एकेडमी ऑफ अमेरिकन पीडियाट्रिक्स के मुताबिक 2 से 5 साल के बच्चे एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन न देखें और 5 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों के स्क्रीन टाइम की भी सीमा हो। यूनिसेफ कोविड-19 के बाद स्क्रीन टाइम को लेकर अपनी गाइडलाइंस पर पुनर्विचार कर रहा है।

4. ऐप/वेबसाइट समावेशी और निष्पक्ष हो: ऐप/वेबसाइट पर यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसे विभिन्न पृष्ठभूमियों के बच्चों के लिए तैयार किया गया है। यानी ये हर तरह की क्षमता, भाषा और दिव्यांग बच्चों के लिए भी सुलभ हो। अगर ऐप फेस रिकॉग्निशन जैसी एआई तकनीक का इस्तेमाल करती हो तो पैरेंट्स सुनिश्चित करें कि वह सभी बच्चों के प्रति निष्पक्ष हो और उम्र, लिंग, नस्ल या अन्य जनसांख्यिकी गुण के आधार पर भेदभाव नहीं करता हो।

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